Kayasth Bhawan is a comprehensive cultural, spiritual, and educational landmark planned on a compact urban footprint of 200 Gaj (approx. 1,800 sq. ft.). Designed as a vibrant hub for community engagement, heritage preservation, and academic inquiry, this multi-utility institution integrates three core pillars under one roof:
An early concept elevation and the approved floor plans & sections for the Bhawan, covering the lower ground, upper ground, first ground, and second floor levels.
Design prepared by one of Rajasthan's leading architects, the owner of World Trade Park, Jaipur.
भूमि पूजन — कायस्थ चेरिटेबल ट्रस्ट, चाकसू। दिनांक 18 अप्रैल 2026।
Adapted from structural planning to form a professional, unified academic and archival wing.
Integrating community heritage storytelling within the spatial plan of the Bhawan.
To ensure long-term operational excellence, transparency, and legal compliance, the project will be governed by a formal framework:
उ जय चित्रगुप्त हरे- स्वामी चित्रगुप्त हरे ।
भक्त जनों के इव्छित फल को, पल में पूर्ण करें।। उ जय ।।
विध्न विनासक मंगल -त्रिभुवन यश् छाई।। उ जय ।
भ्रगतन के प्रति पालक, त्रिभुवन यश छाई।। उ जय ।।
रूप चतुर्भुज, श्यामल, मूरत पीताम्बर राजे।
मातु इरावती – दक्षिणा वाम अंग साजे।। उ जय ।।
कष्ट निवारण, दुष्ट संहारण, प्रभु अर्न्तयामी ।
स़ष्टि संहारण जन दु:ख हारण, प्रकट भये स्वामी ।। उ जय ।।
कलम दवात, क़पाण पत्रिका कर में अति सोह।
बैजन्ती वनमाला, त्रिभुवन मन मोहे ।। उ जय ।।
सिंहासन का कार्य सम्हाला, ब़हमा हर्षाये।
तैतीस कोटि देवता, चरनन में ध्याये।। उ जय ।।
ऩपति सौदास भीष्म पितामह, याद तुम्हें कीन्हा।
बेगि विलम्अ न लायों, इच्छित फल दीन्हा।। उ जय ।।
दारा सुत भागिनि, सब स्वारथ के कर्ता ।
जाउं कहां शरण में, तुम तज में भर्ता।। उ जय ।।
बन्धु पिता, तुम स्वामी, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा आस करूं जिसकी ।। उ जय ।।
चित्रगुप्त जी की आरती, जो जस नित गावे।
चौरासी से छुटे, इच्छित फल पावें ।। उ जय ।।
बोलो श्री चित्रगुप्त जी महाराज की जय ।।
मंगलम मंगल करन, सुन्दर बदन विशाल।
सोहे कर में लेखनी, जय जय दीन दयाल।।
सत्य न्याय अरु प्रेम के, प्रथम पूज्य जगपाल।
हाथ जोड़ विनती करु, वरद हस्त धरु भाल।।
चित्रगुप्त बल बुद्धि उजागर, त्रिकालज्ञ विधा के सागर।
शोभा दक्षिण पति जग वनिदत, हसमुख प्रिय सब देव अनन्दित।।
शान्त मधुर तनु सुन्दर रुपा, देत न्याय सम द्रष्टि अनूपा।
क्रीट मुकुट कुन्डल धुति राजे, दहिन हाथ लेखनी विराजे।।
वाम अंग रिद्धि सिद्धि विराजे, जाप यज्ञ सौ कारज साजे।
भाव सहित जो तुम कह ध्यावे, कोटि जन्म के पाप नसावे।।
साधन बिन सब ज्ञान अधूरा, कर्म जोग से होवे पूरा।
तिन्ह मह प्रथम रेख तुम पार्इ, सब कह महिमा प्रकट जनार्इ।।
न्याय दया के अदभुत जोगी, सुख पावे सब योगी भोगी।
जो जो शरण तिहारी आवे, वुधिवल, मनवल, धनवल पावे।।
तुम व्रहमा के मानस पूता, सेवा में पार्षद जम दूता।
सकल जीव देव कर्मन में वांधे, तिनको न्याय तुम्हारे कांधे।।
तुम तटस्थ सब ही की सेवा, सब समान मानस अरु देवा।
निर्विध्न प्रतिनिधि ब्रहमा के, पालक सत्य न्याय बसुधा के।।
तुम्हारी महिमा पार न पावे, जो शारद शत मुख गुण गावें।
चार वेद के रक्षक त्राता, मर्यादा के जीवन दाता।।
ब्रहमा रचेऊ सकल संसारा, चित्त तत्व सब ही कह पारा।
तिन चित्तन में वासु तुम्हारा, यह विधि तुम व्यापेऊ संसारा।।
चित्त अद्रश्य रहे जग माही, भौतिक दरसु तुम्हारो नाही।
जो चित्तन की सीमा माने, ते जोगी तुम को पहचाने।।
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा, सुगम करहु निज दया अधारा।
अब प्रभु कृपा करहु एहि भांति, सुभ लेखनी चे दिन राती।।
गुप्त चित्र कह प्रेरण कीजै, चित्रगुप्त पद सफल करीजै।
आए हम सब शरण तिहारी, सफल करहु साधना हमारी।।
जेहि जेहि जोनि भभें जड़ जीवा, सुमिरै तहां तुम्हारी सीवा।
जीवन पाप पुण्य तै ऊची, पूजन उपासना सौ सींचौ।।
जो-जो कृपा तुम्हारी पावें, सो साधन को सफल बनावें।
सुमिरन करें सुरुचि बड़भागी, लहै मनोरथ गृही विरागी।।
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, पावें कर्मजोग ते ताता।
अंधकार ते आन बचाओं, मारग विधिवत देव बताओं।।
शाश्वत सतोगुणी सतरुप, धर्मराज के धर्म सहूत।
मसि लेखन के गौरव दाता, न्याय सत्य के पूरण त्राता।।
जो जो शरण तिहारी आबे, दिव्य भाव चित्त में उपजाबे।
मन बुधि चित्त अहिमति के देवा, आरत हरहु देउ जन सेवा।।
श्रमतजि किमपि प्रयोजन नाही, ताते रहहु गुपुत जग माही।
धर्म कर्म के मर्मकज्ञाता, प्रथम न्याय पद दीन्ह विधाता।।
हम सब शरण तिहारि आये, मोह अरथ जग में भरमाये।
अब वरदान देहु एहि भांति, न्याय धर्म के बने संधाति।।
दिव्य भाव चित्त में उपजावें, धर्म की सेवा पावे।
कर्मजोग ते जग जस पावें, तुम्हरि महिमा प्रकट जनावें।
यह चालीस भकितयुक्त, पाठ करै जो कोय।
तापर कृपा प्रसन्नता, चित्रगुप्त की होय।।
पितामह भीष्म से युधिष्ठर जी बोले आपकी कृपा से मैंने धर्मशास्त्र सुने। ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और विशेषकर शूद्रों के सब धर्म आपने कहे। तीर्थ यात्रा विधि कही तथा मास नक्षत्र, तिथि वारों के जो व्रत आपने कहे उनमें यम दिव्तीया का क्या पुण्य है? और यह व्रत किस समय कैसे हो, यह मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।
भीष्म जी बोले, हे युधिष्ठर, यह तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। अत: मैं तुमसे यह कहूंगा। विस्तारपूर्वक धर्मराज जी की यम दिव्तीया को सुनो। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष तथा चैत्रमास की कृष्ण पक्ष की दिव्तीया यम दिव्तीया होती है।
युधिष्ठरजी बोले, कार्तिक एवं चैत्र मास की यम दिव्तीया में किसका पूजन करना चाहिए और कैसे करना चाहिए ?
भीष्मजी बोले, मैं तुम्हें वह पौराणिक उत्तम कथा कहता हूँ जिसके सुनने मात्र से मनुष्य सभी पापों से छूट जाता है इसमें संशय नहीं है। अगले सतयुग में जिनकी नाभि में कमल है उन भगवान से चार मुख वाले ब्रहमाजी उत्पन्न हुए जिन्हें भगवान ने चारों वेद कहे।
पदमनाभि नारायण बोले, हे ब्रहमाजी आप सम्पूर्ण स्रष्टि को उत्पन्न करने वाले, सब योनियों की गति हो। अत: मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण जगत को शीघ्र रचो। हे राजन, श्री हरि के इन वचनों को सुन ब्रहमाजी ने प्रफुल्लित होकर मुख से ब्राहमणों को, भुजाओं से क्षत्रियों को, जंघाओं से वैश्यों को तथा पैरों से शूद्रों का उत्पन्न किया। इसके बाद देव, गन्धर्व, दानव और राक्षस पैदा किये। पिशाच, सर्प, नाग, जल के जीव, स्थल के जीव, नदी-पर्वत और वृक्ष आदि को पैदा कर मनुजी को उत्पन्न किया। तत्पश्चात दक्ष प्रजापतिजी को पैदा कर उनसे आगे की स्रष्टि उत्पन्न करने को कहा। दक्ष प्रजापतिजी से साठ कन्यायें उत्पन्न हुर्इं जिनमें से 10 धर्मराज जी को, 13 कश्यप जी को और 27 चन्द्रमा जी को दीं। कश्यप जी से देव, दानव और राक्षस पैदा हुये तथा गन्धर्व, पिशाच, गौ और पक्षियों की जात पैदा होकर अपने-अपने अधिकारों पर स्थिर हुर्इ। धर्मराज जी ने ब्रहमा जी से आकर कहा – हे प्रभो! आपने मुझे लोकों के अधिकार दिये हैं किन्तु सहायक के बिना मैं वहा कैसे ठहर सकता हूँ ।
ब्रहमा जी बोले, हे धर्मराज मैं तुम्हारे अधिकारों में सहायता करुंगा। इतना कह ब्रहमाजी को छोड़ ध्यान में लगे तथा देवताओं की हजार वर्ष तक तपस्या की। तपस्या के बाद श्याम रंग, कमल लोचन, कबूतर की सी गर्दन वाले, गूढ शिर तथा चन्द्रमा के समान मुख वाले, कलम-दवात और हाथ में पाटी लिये पुरुष को, अपने सामने देखकर ब्रहमाजी बोले, हे पुरुष तुम मेरी काया से उत्पन्न हुये हो, अत: तुम कायस्थ कहलाओगे एवं गुप्त रुप से मेरे शरीर में छुपे होने के कारण तुम्हारा नाम चित्रगुप्त रहेगा।
तत्पश्चात चित्रगुप्त जी कोटिनगर जाकर चण्डीपूजा में लग गये। उपवास कर उन्होंने चण्डीकाजी की भावना अपने हृदय में की। परम समाधि से उन्होंने ज्वालामुखी देवी जी का जप और स्त्रोतों से भजन-पूजन कर उपासना और स्तुति की। उपासना से प्रसन्न होकर देवीजी ने चित्रगुप्तजी को वर दिया – हे पुत्र तुमने मेरा आराधन, पूजन किया इसलिये आज मैंने तुम्हें तीन वर दिये। तुम परोपकार में कुशल, अपने अधिकार में सदा स्थिर और असीम आयु वाले हेावोगे। ये तीन वर देकर देवी अन्त्रध्यान हो गर्इ।
तत्पश्चात चित्रगुप्तजी धर्मराज जी के संग गये और वे आराधना करने योग्य अपने अधिकार पर स्थिर हुए। उस समय ऋषियों में उत्तम सुशर्मा ऋषि ने, जिनको संतान की चाह ना थी, ब्रहमा जी की अराधना की और उनकी प्रसन्नता से इरावती कन्या को पाकर चित्रगुप्तजी के लिए दी। उसी समय चित्रगुप्त जी से उसका विवाह किया। उस कन्या से चित्रगुप्तजी के संग आठ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम चारु, सुचारु, चित्र, मतिमान, हिमवान, चित्रचारु, अरुण तथा आठवां अतीन्द्रिय है।
दूसरी जो मनु की कन्या दक्षिणा विवाही गयी, उससे चार पुत्र हुये जिनके नाम भानु, विभानु, विश्वभानु और वीर्यवान हैं। चित्रगुप्तजी के ये बारह पुत्र पृथ्वी पर फैले। चारु मथुराजी को गए और माथुर कहलाये। सुचारु गौड़ देश को गये इससे वे गौड़ कहलाये। चित्र भटट नदी को गये इससे वे भटनागर कहलाये। भानु श्रीनिवास नगर गये इससे वे श्रीवास्तव हुये। हिमवान अम्बा जी की आराधना कर अम्बा नगर गये जिससे वह अम्बष्ठ हुये, मतिमान अपनी भार्या के साथ सखसेन नगर गये, इससे वे सक्सेना कहलाए। सूरसेन नगर को विभानु गये जिससे वे सूरजध्वज कहलाये। उनकी और भी संताने अनेकानेक स्थानों पर जाकर वसी तथा अनेक उप जाति कहलाये।
उस समय पृथ्वी पर सौराष्ट्र नगर में एक राजा था, जिसका नाम सौदास था। वह महापापी, पराये माल को चुराने वाला, परार्इ स्त्रियो पर बुरी नजर रखने वाला, महाभिमानी और पाप करने वाला था। हे राजन उसने जन्म से लेकर थोड़ा सा भी धर्म नहीं किया। एक बार वह राजा अपनी सेना के साथ बहुत से हिरणों वाले जंगल में शिकार करने गया, वहा उसने निरंतर व्रत करने वाले एक ब्राहमण को देखा। वह ब्राहमण चित्रगुप्तजी और यमराज जी की पूजा कर रहा था। वह यमदिव्तीया का दिन था। राजा ने ब्राहमण से पूछा – महाराज आप क्या कर रहे हो? ब्राहमण ने यम दिव्तीया के व्रत को जिसे वह कर रहा था, कह सुनाया। सुनकर राजा ने वहीं उसी दिन कार्तिक मास में व्रत किया।
कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की दिव्तीया के दिन धूप तथा दीपादि सामग्री से चित्रगुप्त जी के साथ धर्मराज जी का पूजन किया। व्रत करने के बाद राजा धन सम्पतित से युक्त अपने घर आया। कुछ दिन उसके मन का विस्मरण हुआ और वह व्रत भूल गया, याद आने पर फिर व्रत किया। तत्पश्चात काल संजोग से वह राजा सौदास मर गया और यमदूतों ने द्रढ़ता से उसे बांध कर यमराज जी के पास पहुँचाया। यमराज जी ने रुंधे मन से उसे अपने दूतों से पिटता देख चित्रगुप्त जी से पूछा कि इस राजा ने क्या किया? जो भी अच्छा या बुरा इसने किया हो मुझे बताओ। धर्मराज के ये वचन सुनकर चित्रगुप्तजी बोले, इसने बहुत से खोटे कर्म किये हैं, कभी देवयोग से एक व्रत किया जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की यम दिव्तीया नाम की दिव्तीया होती है, उस दिन आपका और मेरा चन्दन, फूल आदि सामग्री से एक बार भोजन के नियम से और रात्रि जागरण कर पूजन किया। हे देव, इस विधि से राजा ने व्रत किया इससे यह राजा नरक में डालने योग्य नहीं है।
चित्रगुप्त का यह वचन सुनकर धर्मराजजी ने उसे छुड़ा दिया। इस यम दिव्तीया के व्रत से वह उत्तम गति को प्राप्त हुआ। बोलिए भगवान चित्रगुप्त जी की जय।
भगवान चित्रगुप्त पृथ्वी के सभी धर्मो का लेखा–जोखा रखने वाले के रुप में जाने जाते हैं। उत्तर भारत की मान्यताओं के आधार पर भगवान चित्रगुप्त जी की दो पत्निया माँ एरावति उर्फ शोभावति तथा माता जग नंदिनी उर्फ सुदक्षिणा थीं। दोनों पत्नियों से बारह पुत्र – 1.श्रीवास्तव 2.सक्सेना 3.माथुर 4.कुलश्रेष्ठ 5.भटनागर 6.निगम 7.अम्बष्ट 8.सूरध्वज 9.कर्ण 10.गौड़ 11.अस्थाना व 12.बाल्मीक थे। इनमें से कौन किस माता के पुत्र थे और उम्र में कौन बड़ा और छोटा था इसमें बड़ा मतभेद है।
इसी प्रकार दक्षिण भारत में प्रचलित मतानुसार (भारती विधा भवन बम्बर्इ की पुस्तक कल्चर कोर्स पुस्तक 10 दसवीं कक्षा हेतु 1991 में प्रकाशित (Lord Chitragupta पाठ से) भगवान चित्रगुप्त की तीन पत्निया प्रभावतीए नीलावती व कार्णिकी थीं। दक्षिण भारत में चित्रगुप्त जी के 14 मंदिर में एक काची (काचीपुरम) में है जिसमें सभी वर्णों के भक्त उन्हें केतुग्रह के आदि देवता के रुप में पूजते हैं।
कालान्तर में इन सभी भार्इयों की सन्तानें आवश्यकतानुसार परिस्थिति वश स्थान व कार्य बदलने के कारण क्षेत्रिय नामों व अल्लों से विख्यात होते गये। इन कायस्थों की वंशावलियां ”अल्लैं” जो अभी तक जानकारी में आ सकीं, निम्न हैं –
1. श्रीवास्तव के गोत्र (43)
2. सक्सेना (189)
3. माथुर (183)
4. गौड़ (24)
5. भटनागर (83)
6. निगम (42)
7. कर्ण (360)
8. सूरध्वज सौकालीन गोत्रीय घोषवंशीय षांडिल्य, असित, देवता दक्षिण में सूर्य प्रभु या बंगाल में उत्तर राढ़ीय तथा वारेन्द्र तथा कुल या वंश से जाने जाते हैं। अधिक प्रमाणिक विवरण प्राप्त नहीं।
9. अम्बष्ट, 10. कुलश्रेष्ठ, 11. बाल्मीक, 12. अस्थाना।
श्री चित्रगुप्त जी महाराज पत्नी
| इरावती (शोभावती) — धर्मशर्मा की पुत्री | नन्दनी (सुदक्षिणा) — श्राद्वदेव की पुत्री |
|---|---|
| चारु (माथुर) | भानु (श्रीवास्तव) |
| सुचारु (गौड़) | विभानु (सूरजध्वज) |
| चित्र (भटनागर) | विश्वभानु (बाल्मीकि) |
| मतिमान (सक्सेना) | वीर्यभानु (अष्ठाना) |
| हिमवान (अम्वष्ट) | |
| चित्रचारु (निगम) | |
| चित्रचरण (कर्ण) | |
| अतीनिद्रय (कुलश्रेष्ठ) |
अनादि काल से ही विश्व रचयिता भगवान व्यवस्थापक की पूजा अर्चना प्रचलित है। भगवान के नाम देश काल के अनुसार अवश्य भिन्न हैं। भारत में असंख्य देवी देवताओं की मान्यता है तथा यह उनके पूजा गृहों का देश है। ये पावन स्थान सार्वजनिक रुप से भारतीयों की संस्कृति के धोतक है।
जीव मात्र के कृत्यों का लेखा जोखा रखने वाले भगवान श्री चित्रगुप्त के मंदिर की कमी नहीं हैं। इनके भी अनेक प्राचीन मंदिर हैं। काल की गति तथ सुप्रबन्धन के अभाव में अनेकों घ्वस्त हो गयें है ंकिन्तु इनका असितत्व किसी न किसी रुप में अवश्य है। भगवान चित्रगुप्त जी का एक प्राचीन मंदिर ‘धर्म हरि मंदिर’ के नाम से अयोध्या में है, कुछ अन्य मंदिर भी हैं। मान्यता है उज्जैन में भगवान श्री चित्रगुप्त का दीर्घकालीन तपस्या काल बीता, वहा केवल अवशेष ही हैं उनका जीर्णोद्वार हो रहा है।
भगवान श्री चित्रगुप्त के मंदिर कहा, कितने और किस दशा में हैं इसकी विस्तृत जानकारी के अभाव में पूरी प्रस्तुति करना तो संभव नहीं है किन्तु जो जानकारी उपलब्ध है उसको आधार मानकर अगे बढ़ना सम्भव है।
आवश्यकता है भगवान श्री चित्रगुप्त के इन मंदिर के विषय में शोध कार्य करने की जिससे इनकी विस्तृत आनकारी संग्रहीत हो सके। स्व0 निरंकार सहाय ‘निराकार’ ग्वालियर ने इस दिशा में कुछ प्रयास किया था किन्तु वे अल्पायु में संसांर से विदा हो गये। यह सूचि केवल सांकेतिक है शोध कार्य करने वाले के समक्ष एक विशाल क्षेत्र है कोर्इ युवा इस कार्य को आगे बढ़ाये तो संग्रहणीय शोध ग्रन्थ तैयार हो सकता है।
‘अब आवश्यकता इस बात की है कि कायस्थ बारह नहीं, बलिक कायस्थ केवल कायस्थ है, उसे इस मत का होना पड़ेगा। सभी कायस्थों में समान रुप से विवाह आदि सम्बन्ध स्थापित किये जाने चाहिए, न कोर्इ ऊचा है न कोर्इ नीचा है।’
कायस्थ शब्द का परिचय — कायस्थ शब्द सर्व प्रथम पुराणों में धर्मराज अथवा यमराज के मंत्री के रुप में चित्रगुप्त-देव के विशेषण अथवा उपाधि के रुप में प्रयुक्त हुआ है। पुराणों से पूर्वकाल में रचित सूत्र ग्रन्थों में चित्रगुप्त का नाम तो मिलता है किन्तु उनके विशेषण के रुप में कायस्थ शब्द नहीं मिलता। इस सम्बन्ध में ‘बौधायन स्मृति’ के पृष्ठ 455 अध्याय 5 के सूत्र 140 में ‘ऊं चित्रगुप्तम तर्पयामि’ तथा कातीय तपर्ण सूत्र में ‘यमांश्चैके’।
यमाध्र्माराजाय मृत्यवेचान्तकाय च। वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च।।
औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेषिठने। वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय ते नम:।।
एकैकस्य त्रीस्त्रीन दधाज्जलान्जुलीन। यावज्जन्म कृतम पापम तत्क्षणादेवनश्यति।।
किन्तु पुराण काल के पश्चात बारहवीं शताब्दी में कायस्थ शब्द, श्री हर्ष विरतिचत ‘नैषधीय चरित’ में ‘दृग्गोचरोअभूदथ चित्रगुप्त: कायस्थ: उधैगर्ुणतदीय:।’ तथा इंडियन ऐणिडक्वेटी जिल्द-19 पृष्ठ 59 पंकित् 15 में ‘दक्ष: प्राज्ञो विनीतात्मा गुरुभक्त: प्रियंवद:। तृप्तो∙र्थेरौपकश्र्चासिमन कायस्थो गोमिकांगंूज:।’ प्रयुक्त हुआ। विष्णु धर्म सूत्र (विष्णु स्मृति के अध्याय 7 गधांश 3 में ‘राज्याधिकरणे तनिनयुक्त कायस्थ कृत तदध्यक्ष करं चिनिहतम राजा साक्षिकम’ के अनुसार ‘कायस्थ को राजलेखक माना गया है। क्षेमेन्द्रकृत ‘नर्ममाला’ में कायस्थ को गृह कृत्याधिपति’ अथवा ‘गृह-महत्तम’ (होम मिनिस्टर) कहा गया। इसी ग्रंथ के प्रथम परिहास के प्रथम श्लोक में तो कायस्थ को परमेश्वर का रुप कहा गया है।
येनेदम स्वैच्छया, सर्वम, माययाम्मोहितम जगत। स जयत्यजित: श्रीमान कायस्थ: परमेश्वर:।।
‘उत्तर गीता’ के प्रथम अध्याय के श्लोक 27 से 31 ‘काय-स्थो पि न जायते काय-स्थोपिन भुंजान: काय-स्थो पि न बाध्यते।’ के अनुसार कायस्थ को परमात्मा कहा गया है।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण के तृतीय खण्ड 51 श्लोक 13 में ‘कायस्थ चित्रगुप्त को अन्तर्यामी कहा गया है। यथा – ‘चित्रगुप्तो विनिर्दिष्टतयात्मा सर्व-देह-ग:। पत्रम धर्ममधर्म: च करस्था तस्य लेखिनी।।’ इतियादि के अनुसार कायस्थ शब्द कपोल कलिपत अथवा अर्वाचीन न होकर सनातन अथवा अत्यन्त प्राचीन है।
कायस्थ की व्युत्पति — पुराणों के अनुसार नवग्रहों में अनितम (नवम) केतु ग्रह की अधि देवता तथा प्रत्यधिदेवता क्रमश: ब्रह्राा जी व चित्रगुप्त जी हैं। चित्रगुप्त जी ब्रह्राा जी के ध्यान-ज-पुत्र हैं। उत्पतित से पूर्व चित्रगुप्त ब्रह्रााजी के काय (शरीर) में सिथत (‘स्थ’) थे जो ब्रह्राा के ध्यान करने से प्रकट हो गये। अत: वे ब्रह्रा-कायस्थ हुए। जो समयोपरान्त कायस्थ कहलाये। इस महाजाति के अन्तर्गत चित्रगुप्त वंशय, बंगीय, महाराष्ट्रीय, इत्यादि अवान्तर भेद तथा उनके भी उपभेद रुप सूर्यद्विज, श्रीवास्तव, निगम, गौड़, माथुर, भटटनागरादि, उत्तरराढ़ीय वारेन्द्र, वंगज, आदि कायस्थों की विविध जातियां बनी।
डा0 अंगन लाल (फिरोजपुर-पंजाब) के कायस्थ वर्ण-निर्णय (उदर्ू) तथा ‘कायस्थ सर्वस्व ग्रन्थ’ के संकलनकर्ता पं0 रवीचन्द्र शास्त्री (जोधपुर-राजस्थान) के अनुसार कायस्थ नाम की एक पृथक जाति सदैव से चली आ रही थी और उन्होंने ‘क्षत्रिय’ वर्ग की जाति कह डाला किन्तु प्राचीनतम पुराणों के तथ्यों का निरुपण करने पर, वास्तविक इतिहास से परे यह कल्पना सिद्व नहीं हो पाती। महाराज चित्रगुप्त देव के बारह पुत्रों – भानु, विभानु, विश्वभानुख् वीर्यवान, चारु, चित्रचारु, मतिमान, सुचारु, चारुरत, हिमवान, चित्र और अतीनिद्रय हुए जिनके वंशज क्रमश: श्रीवास्तव, सक्सेना, सूरजध्वज, निगम, कुलश्रेष्ठ, माथुर, कर्ण, भटनागर, वाल्मीक आदि कहलाये।
कायस्थों की उत्पतित और हिन्दू समाज में उनके स्थान के विषय में 1884 र्इ0 में अपना निर्णय देते हुए कलकत्ता के उच्च न्यायालय ने उन्हें शूद्र वर्ग में देखा। इससे क्षुब्द होकर उत्तर प्रदेश के कायस्थों ने इलाहाबाद हार्इ कोर्ट में यह तर्क दिया कि उत्तर प्रदेश और बिहार के कायस्थों की उत्पतित भिन्न है। सन 1889 में इलाहाबाद हार्इ कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के कायस्थों को क्षत्रिय मानते हुए अपना फैसला सुनाया। 23 फरवरी 1926 को पटना हार्इ कोर्ट ने उस समय तक के निर्णयों की समीक्षा करते हुए और हिन्दू ग्रन्थों के आधार पर उन्हें क्षत्रिय घोषित किया।
1975 में इलाहाबाद से प्रकाशित एक पुसितका में उन्हें ब्राह्राण वर्ण का सिद्व किया गया। किन्तु ब्राह्राण उन्हें पाचवें वर्ण का मानते हैं और उनकी उत्पतित प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न बताते हैं। इसका खण्डन करते हुए पटना हार्इ कोर्ट ने कहा कि मनुस्मृति ने अध्याय 10 श्लोक 4 में मानव जाति को मात्र चार वर्णों में बांटा है। अत: कायस्थों का स्थान उन्हीं चार वर्णों में निशिचत करना पड़ेगा।
उस निर्णय में ‘यम संहिता’ के उल्लेख से यह कहा गया कि धर्मराज द्वारा अपने कठिनाइयों की शिकायत करने पर ब्रह्राा ने अपनी काया से चित्रगुप्त को उपन्न किया और उन्हें ‘कायस्थ कहा और उनसे बारह सन्तानें हुर्इ जिनसे बारह उप जातियों के कायस्थ हुये। विभिन्न स्मृतियों के आधार पर यह भी कहा गया कि कायस्थ का काम लेखक और गणक का था और उसकी अपनी लिपि थी, जिसे कैथी कहते हैं।
पटना हार्इकोर्ट ने निर्णय दिया कि कायस्थ क्षत्रिय हैं। ‘वृहदारण्यक उपनिषद’ में जो स्मृतियों और पुराणों से पुराना है, याज्ञवल्क्य ने प्रथम अध्याय के 11 वें मंत्र में कहा है कि सृषिट के आरम्भ में ब्रह्रा अकेला था। उसने पहिले ‘क्षत्र’ उत्पन्न किया। जब उससे काम न चला तो वैश्य उत्पन्न किया और जब उन दोनों से काम न चला तो शूद्र उत्पन्न किया।
कायस्थों की उत्पतित के बारे में स्मृतियों और पुराणों की यह बात सही है कि वे प्रथम लेखक और गणक रहे हैं उन्हें धर्मशास्त्रों का ज्ञान था। दिल्ली विश्वविधालय के प्रोफेसर डी0 एन0 झा और कृष्ण मोहन श्रीमाली ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत का इतिहास’ में लिखा है कि एक जाति के रुप में कायस्थों का आविर्भाव एक महत्वपूर्ण सामाजिक घटना है, तथा कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में है, जिसमें राजा को शोषित प्रजा की, विशेषकर कायस्थों से, रक्षा करने को कहा गया है।
10वीं और 12वीं शताब्दी में विभिन्न स्थानों के आधार पर कायस्थों की उपजातियां बन गर्इं जैसे बंगाल से आये गौड़ कायस्थ, बल्लभी कायस्थ, सक्सेना, माथुर, श्रीवास्तव, निगम आदि। महाजनी की ही भांति कायस्थों की अपनी विशेष लिपि ‘कैथी’ थी जिसका प्रचार बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्व तक बना रहा।
प्रार्थनात्मक मन्त्र चारों वेदों में आया है। गायत्री मंत्र वैदिक वाडमय में अति प्रसिद्व है। किन्तु वह तीन वेदों में ही वर्णित है, जबकि ‘चित्रम देवानम’ मन्त्र सभी वेदों में प्रतिपादित हैं। आर्य समाजी लोग नित्य सायं-प्रात: सन्ध्या करते समय इस मन्त्र का पाठ करते हैं तथा इसे पर ब्रह्रा परमात्मा का प्रतिपादक मन्त्र मानते हैं।
‘चित्रम’ शब्द का अर्थ परमात्मा के वैचित्रय से लगाते हैं। ‘चित्र’ भी उसी परमात्मा का नाम है, वह एक आश्चर्य है, महद आश्चर्य। भक्त उसे अपने आप में साक्षात करता है। वह अन्तरात्मा है, आत्मा की आत्मा, परम आत्मा।
श्री चित्रगुप्त कथा में कहा है वह कायस्थ है। काया में सिथत है। उसे शरीर से बाहर वास्तविक रुप में कोर्इ नहीं देख सकता। बाहर तो उसका मायिक रुप दिखार्इ देता है। उसका माया रहित स्वरुप तो कायस्थ है — हृदयस्थ है, आत्मस्थ है।
वेदों में इन चित्रों को हमारे कर्मों का खाता कहा गया है। ये चित्र जन्म-जन्मान्तरों के कर्मों के रुप हैं। चित्रगुप्त वे दिव्य देवता हैं जो इन चित्रों का गोपन करते हैं, संरक्षण करते हैं। जो इन चित्रों के स्वामी हैं, चित्रगुप्त हैं। इन चित्रमय खातों को देखकर ही प्राणी के कर्मां को पढ़ते हैं तथा निर्णय करते हैं, दु:ख-सुख प्रदान करते हैं।
इससे स्पष्ट हो जाता है कि चित्रगप्त स्वंय पर ब्रह्राा परमेश्वर हैं। पुकारने पर अवतरित होते हैं, कर्म फलों के दाता हैं, अच्छे बुरे कर्मों के निर्णायक हैं। देव, दानव, यक्ष, किन्नर, ब्रह्राा, विष्णु, महेश सभी उनके न्याय क्षेत्र में आते हैं। आइए, हम सभी कायस्थ अपने कुलदेव भगवान चित्रगुप्त की आराधना कर अनन्त पुण्य प्राप्त करें।
‘कायस्थ’ शब्द आज एक ऐसा शब्द है जो चित्रगुप्त की विभिन्न सन्तानों से उदभूत हुये महापरिवार का धोतक है। स्व0 रघुबर मिटठूलाल शास्त्री ने सन 1974 र्इ0 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘कायस्थ कौन है ?’ में इस बात पर व्यापक प्रकाश डाला है कि ‘कायस्थ’ शब्द जातिवाची न होकर पदवाची है और यह पद प्राय: ब्राह्राण को ही दिया जाता है।
कुछ वर्ष पहले तक कायस्थों का असितत्व गुप्तकाल में स्वीकार किया जाता था क्योंकि उसी काल से ‘कायस्थ’ शब्द का उल्लेख मिला है। कुमारगुप्त प्रथम तथा बुध गुप्त के दामोदरपुर (बंगाल) ताम्रपत्र अभिलेखों में उपरिक कुमारामात्य, नगरश्रेषिठ, सार्थवाह तथा प्रथम कुलिक के साथ-साथ प्रथम कायस्थ के उल्लेख पाये जा चुके हैं जिन्हें सर्वसम्मत पदाधिकारी माना जा चका है।
इसी प्रकार कुमारगुप्त प्रथम से भी पहले चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य को पटरानी ध्रुवस्वामिनी की गढ़वा से मिली एक मोहर पर भी कायस्थ का उल्लेख है, जिसमें ‘ज्येष्ठकायस्थ’ का अर्थ प्रधान लिपिक से है।
गुप्तकाल के कतिपय अन्य ग्रन्थों में भी पदवाची शब्द ‘कायस्थ’ का उल्लेख पाया गया है। श्रीशूद्रक विरचित मृच्छकटिकम् नाटक में ‘श्रेषिठ-कायस्थौ’ अर्थात श्रेषिठ और कायस्थ का एक साथ उल्लेख है। इस विवरण से भी ‘कायस्थ’ शब्द लिपिक जैसे किसी पद का बोध कराता है, जाति का नहीं।
मथुरा से मिले प्रथम शती र्इ. के एक अभिलेख में आये ‘कायस्थ’ शब्द से कायस्थों का ऐतिहासिक असितत्व र्इसा की प्रथम शती से ही स्वीकार किया जा सकता है। इस अभिलेख में एक वंश की तीन पीढ़ियों में से केवल एक (भट्टप्रिय) के नाम के आगे ‘कायस्थ’ शब्द है, उसके पिता व पितामह के नाम के आगे नहीं — जिससे स्पष्ट होता है कि यहाँ भी कायस्थ शब्द जातिवाची न होकर पदवाची है।
संक्षेप में कायस्थ मूलत: एक पद था जिसका असितत्व कुषाणकाल तक असंदिग्धरूप से स्वीकार किया जा सकता है। उस पद पर प्रतिष्ठा पाने वाले प्राय: ब्राह्राण हुआ करते थे। आगे चलकर कायस्थों का एक वर्ण बन गया, ठीक जैसे जैन धर्मावलम्बियों ने बना लिया।
संसार के अति प्राचीन ग्रन्थ वेदों में चित्र का वर्णन, इन्द्र, मित्रवरुण अगिन, मारूत सोम जैसे देवतुल्य रूप में आया है, जिसकी पुषिट डा0 रांगेय राघव की ‘प्राचीन भारतीय परम्परा एवं इतिहास’ नामक पुस्तक में भी की गर्इ है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी वेद में वर्णित चित्र का अर्थ अत्यन्त ऐश्वर्यवान, दान आदि गुणों में महान, आश्चर्ययुä गुण कर्मवान किया है, जो राज्य लक्ष्मी से परिपूर्ण राजन के रूप में सम्बोधित है।
ऋग्वेद मण्डल 10 के विवस्वत कुल और यम वंश में चित्र, चित्रथ, चित्रम, चित्रचारू, चित्रभानु आदि का उल्लेख मिलता है। अर्थवेद 06-106-32-33-35 में भी ‘चित्र’ को जीवनदाता, महान देव समान तेजस्वी, विजयी मित्र वरुण सूर्य और आत्मा आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।
कृष्ण दैपायन वेद व्यास ने उत्तर मीमांसा में ‘चैत्रथ’ का क्षत्रिय वर्ण होना वर्णन किया है। यजुर्वेदीय मैत्रेयी संहिता में ‘चित्र’ नाम की व्याख्या भी संस्कृत श्लोकों में की गयी है जिसमें चित्रगुप्त के तेजस्वी वीर्य धारण से प्राप्त राजा ‘चित्र’ (आश्चर्य) नाम से विख्यात हुआ बताया गया है।
‘बहौश्य क्षत्रिय जाता कायस्थ अगतितवे। चित्रगुप्त: सिथति: स्वर्गे चित्रोहिभूमण्डले।।’ — अर्थात प्राचीन काल में क्षत्रिय जाति में कायस्थ इस जगत में हुये, उनके पूर्वज चित्रगुप्त स्वर्ग में निवास करते हैं तथा उनके पुत्र चित्र इस भूमण्डल में सिथत हैं।
‘कायस्थ क्षित्रयों वर्णों न तु शूद्रय कदाचन। अतोभवेयु संस्कारा गर्भधानादिकोदश।’ (शब्दकल्पद्रुम विज्ञान तन्त्र) — अर्थात कायस्थ क्षत्रिय वर्ण हैं, शूद्र वर्ण कदापि नहीं क्योंकि यह अत्यन्त उच्च ग्यारह संस्कारों, गर्भाधान आदि का पालन करते हैं।
इस प्रकार वेद में वर्णित राजा चित्र, चित्रथ, चित्रभानु, चित्रचारू आदि प्रसंगों के मंत्र उदधृत किये गये हैं। अत: वेदों में चित्र वंश के प्रमाण स्पष्टतया मिलते हैं, जिसका वर्णन अदभुत, आश्चर्ययुक्त, यशवान, धनधान्य से प्रजा को परिपूर्ण करने वाला दानवीर, दाता, प्रदाता क्षत्रिय राजा के रूप में किया गया है।
यम संहिता के अनुसार, धर्मराज ने जिन्हें पापियों को दण्ड देने का अधिकार मिला है, श्री ब्रह्राा जी की सेवा में जाकर निवेदन किया कि ऐसा भारी काम मुझसे नहीं चल सकता। ब्रह्राा जी ने ध्यान में लगकर हजार वर्ष तक तप किया, जिसके बाद श्यामवर्ण, कमल नयन पुरुष हाथ में कलम-दवात और पाटी लिये प्रकट हुए। ब्रह्राा जी ने कहा कि ‘तुम मेरी काया से उत्पन्न हुए और काया में सिथत थे, इसी से तुम्हारा नाम कायस्थ रखा गया, और यह चित्र वाक से हमने गुप्त रक्खा था, इसलिये पंडित तुम्हें चित्रगुप्त कहेंगे’।
पद्म पुराण, सृषिट खण्ड के अनुसार, ब्रह्राा की काया से चित्रगुप्त की उत्पत्ति हुर्इ, उससे जाति कायस्थ कहलार्इ; उसकी सन्तान में अनेक गोत्र के कायस्थ पृथ्वी पर हैं। भविष्य पुराण में ब्रह्राा जी कहते हैं कि ‘तुम हमारी काया से उत्प™ा हुए इसलिए तुम्हारा नाम कायस्थ हुआ… क्षत्रिय वर्ण के लिए जो उचित है, उसे पालन करते हुए पृथ्वी पर सन्तान उत्प™ा करो’।
स्मृतियों के वचन: विष्णु धर्मसूत्र के अनुसार सरकारी दस्तावेज वह है जिसे राजा के आगे उसका नियुक्त कायस्थ बनाये और उस पर उसके अधिकारी के हस्ताक्षर हों। याज्ञवल्क्य स्मृति कहती है कि राजा को चाहिए कि विशेष करके कायस्थों के द्वारा पीडि़त प्रजा की रक्षा करें। नारद स्मृति और बृहस्पति स्मृति में भी राजा, सभासद, गणक, लेखक आदि के साथ कायस्थ को राज्य-प्रशासन के महत्वपूर्ण अंगों में गिना गया है।
शुक्र नीति के अनुसार कोतवाल, चौधरी, तहसीलदार, लेखक (कायस्थ), कर लेने वाला और बरकंदाज — ये छ: हर गाँव में नियत होने चाहिए। शिलालेखों और ऐतिहासिक ग्रन्थों में भी अनेक कायस्थों — जैसे गौड़ कायस्थ श्रीपती, माथुर कायस्थ गदोगक, नागर कायस्थ दुपिस्तुर, श्रीवास्तव कायस्थ उदय करण, त्रिभोज, राय हीरामल, ठाकुर रामनाथ, राजा टिकयत राय, राजा नवल राय आदि — के प्रशासनिक योगदान का उल्लेख मिलता है।
पुराने लखनऊ के लक्ष्मण टीले के पास रहने वाले ब्राह्राण और कायस्थ थे, यह भी उल्लेखनीय है।
प्राचीन भारतीय इतिहास की मूल्यवान एवं आधार सामगि्रयों में उत्कीर्ण लेखों का अत्यधिक महत्व है। प्राचीन भारतीय अभिलेखों में शासन अथवा दान के प्रसंग में दाता की जाति का उल्लेख हुआ है। अशोक के अभिलेख में कायस्थों की चर्चा है, जहाँ उन्हें ‘लजुक’ अथवा ‘राजुक’ (प्रान्तीय राज्यपाल) पद से सम्बोधित किया गया है।
पांचवीं सदी के गुप्तकालीन दामोदरपुर ताम्रपत्र में प्रथम कायस्थ अथवा ज्येष्ठ कायस्थ के नाम से उल्लेख मिलता है, जो विषय-परिषद के सदस्य होते थे। अभिलेखों में बंगाल के गौड़ कायस्थ का विशेष वर्णन आया है — गौड़ कायस्थ प्रशसित लिखने में पूर्ण दक्ष थे तथा सुलेखक होने के कारण मध्य प्रदेश तथा राजपूताना के राजाओं द्वारा बुलाए जाते थे।
चन्देलों के खजुराहो से प्राप्त प्रशसित से ज्ञात होता है कि कायस्थ ‘करण’ या करणिक नाम से भी पुकारे जाते थे, और उन्हें संस्कृत का अच्छा ज्ञान रहता था, इस कारण शुद्व लिख सकते थे। बिहार से प्राप्त 1175 र्इ0 के गया जिला के ‘मेरा विष्णु मनिदर’ अभिलेख में भी प्रशसित लेखक के रुप में कायस्थ जाति के माहेश्वर का उल्लेख मिलता है।
कलचुरी (मध्य प्रदेश) राजाओं के अभिलेखों से भी कायस्थों के महत्व के विषय में जानकारी मिलती है। बिलासपुर जिले के कोसगर्इ के किले से मिले वाहरेन्द्र राजा के शिलालेख में प्रशसित लेखक रामदास को कायस्थ वंश में जन्मा तथा वाहरेन्द्र राजा का विश्वासपात्र कायस्थ-कुल का दीपक जगन्नाथ बताया गया है।
भारतवर्ष में भगवान चित्रगुप्त जी के अनेक मंदिर हैं, परन्तु इनमें से पौराणिक एवं एतिहासिक महत्व के प्रथम चार मंदिर, कायस्थों के चार धामों के समतुल्य महत्व रखते हैं:
1. श्री चित्रगुप्त शिला मंदिर, अंकपात, उज्जैन (मध्य प्रदेश): मान्यता है कि श्री चित्रगुप्त जी का प्रादुर्भाव कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, उज्जयिनी के अंक-पात क्षेत्र में हुआ था, जहाँ उन्होंने देवगुरु बृहस्पति व शुक्राचार्य से शिक्षा प्राप्त कर धर्मराज के सहायक का पदभार ग्रहण किया। सन 1985 में उज्जैन निवासी चित्रांश बंधुओं ने ‘चित्रगुप्त शिला’ पर एक मंदिर बनवाया, जो अब ‘श्री चित्रगुप्त शिला मंदिर’ कहलाता है।
2. श्री धर्महरि चित्रगुप्त मंदिर, अयोध्या, जिला फैजाबाद (उत्तर प्रदेश): पौराणिक गाथाओं के अनुसार स्वयं भगवान विष्णु ने इस मंदिर की स्थापना की थी। किंवदंती है कि विवाह के बाद जनकपुर से वापिस आने पर श्रीराम-सीता ने सर्वप्रथम धर्महरि जी के ही दर्शन किये थे। सन 1882 में एक्सट्रा असिस्टेन्ट कमिश्नर श्री महेश प्रसाद जी के प्रयासों से ‘कायस्थ धर्म सभा अयोध्या’ की स्थापना हुर्इ थी।
3. श्री चित्रगुप्त स्वामी मंदिर, काचीपुरम (तमिलनाडु): दक्षिण भारत के तमिल क्षेत्र में इसे करुणीगर कायस्थों का मंदिर माना जाता है। मंदिर का स्थापत्य बहुत सुन्दर, भव्य और गरिमामय है; गर्भगृह में हाथों में कलम-दवात लिये भगवान चित्रगुप्त स्वामी के साथ देवी कार्नकी की कास्य प्रतिमा स्थापित है।
4. श्री चित्रगुप्त आदि मंदिर, पटना सिटी (बिहार): दीवान मोहल्ले के नौजरघाट पर गंगा तट पर स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर, कहा जाता है, सर्वप्रथम नंद वंश के अंतिम मगध सम्राट धनानन्द के महामंत्री चित्रगुप्तवंशी ‘राक्षस’ ने बनवाया था; बाद में राजा टोडरमल ने सन 1574 में मूर्ति स्थापित करार्इ। दशकों से हुए अतिक्रमण को हटाकर आज यह मंदिर पटना के कायस्थों की काशी बन चुका है।
समाज, सभ्यता और संस्कृति सतत प्रवाहित सलिला है। परमपिता ब्रह्राा की काया से उपजे ब्रह्राात्मज श्री चित्रगुप्त वास्तव में विचार शकित से उत्पन्न कर्म शकित हैं। सचराचर की समस्त कायाओं में जो सिथत है वहीं कायस्थ हैं — ”काये सिथति: स: कायस्थ:”। समस्त कायाओं में सिथत कौन हो सकता है? केवल परम ब्रह्रा; तब कायस्थ वह है जो देव चित्रगुप्त का अंश है, सचराचर में व्याप्त है, अविनाशी, अनश्वर, अनादि, अनंत है।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण के अनुसार, ”चित्रगुप्तो विनि र्दिष्टस्तथात्मा सर्वदेहग:। पत्रम धर्म धर्मचकायस्था तस्य लेखनी।।” अर्थात सब देहों में रहने वाला आत्मा (परमात्मा) चित्रगुप्त है, जिनके हाथ में धर्माधर्म का निर्णय करने वाली लेखनी और पत्र है।
उत्तरगीता (अध्याय 1, श्लोक 28) में कहा गया है — ”कायस्थो∙पि न कायस्थ कायस्थो∙पि न जायते। कायस्थो∙पि न भुज्जान: कायस्थो∙पि न बध्यते।।” अर्थात काया में सिथत होते हुए भी न होना, सुख-दुख भोगते हुए भी उनमें न बंधना ही कायस्थ का लक्षण है।
चित्रगुप्त वंशज कायस्थ अपने आदिदेव परात्पर ब्रह्रा के व्यक्तरुप चित्रगुप्त के गुण-कर्मानुरुप आचरण कर समाज में पूज्य व मान्य हुए। कायस्थों को प्रशासनिक अभिकरणों, औषधीय ज्ञान, सैन्य विभाग व राजस्व प्रबंधन का पर्याय माना गया। श्रुति-स्मृति के युग में लेखनि, लिपि, मसि तथा पत्र का अविष्कार कर कायस्थ (चित्रगुप्त) ने ज्ञान-विज्ञान को लौकिक जनकल्याण का पथ दिखाया। स्वामी विवकानंद ने कहा भी है कि भारतीय संस्कृति से कायस्थों का योगदान निकाल दिया जाये तो शेष कुछ भी नहीं बचेगा।
कायस्थ अर्थात अपनी काया से इसी तरह सिथत होना कि हर काया में सिथत (व्याप्त) हो सकें, तभी आप समस्त मानव जाति में व्याप्त होकर ‘वसुदैव कुटुम्बकम’ के आदर्श को जीवन्त कर विश्वमानव ‘कार्यस्थ’ बन सकेंगे — इस अर्थ में कायस्थ जाति ही सच्ची जीवन पद्वति है।
वर्ण व्यवस्था के अनुसार हिन्दुओं को ब्राह्राण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र चार वर्णों में विभाजित किया गया है। कायस्थ जाति, जो वास्तव में क्षत्रिय वर्ण में आती है, पर उस समय प्रश्न चिन्ह लग गया जब कलकत्ता हार्इ कोर्ट ने एक मुकदमे में यह घोषित कर दिया कि बंगाल के कायस्थ शूद्र हैं। द्वितीय अपील, र्इश्वरी प्रसाद बनाम राय हरिप्रसाद, में पटना हार्इ कोर्ट ने पर्याप्त जांच-पड़ताल, उपनिषदों व धार्मिक पुस्तकों के गहन अध्ययन के उपरान्त यह निर्णय दिया कि कायस्थ जाति का वर्ण क्षत्रिय है।
श्री सर्वाधिकारी, श्री गोपाल चन्द्र शास्त्री तथा श्री जोगेन्द्र चन्द्र घोष जैसे प्रमुख हिन्दु विद्वानों ने कलकत्ता हार्इ कोर्ट के निर्णय को स्वीकार नहीं किया और कहा कि केवल यज्ञोपवीत धारण न करना या कुल नाम बदलना किसी जाति की अवनति का प्रमाण नहीं हो सकता।
ऋषियों की स्मृतियों जैसे मनु, याज्ञवल्क्य, व्यास, वशिष्ठ आदि ने मनुष्यों को चार वर्णों में विभाजित किया है, अत: कायस्थों को इन्हीं चारों वर्णों में से किसी एक में स्थान देना है। पदम पुराण, भविष्य पुराण, गरुड़ पुराण आदि के अनुसार चित्रगुप्त की दो पत्नियों से प्राप्त 12 पुत्र यज्ञोपवीत धारण करते थे तथा उनका व्यवसाय क्षत्रियों के समान होना बताया गया है।
भविष्य पुराण में कहा गया है, ‘चूकि तुम मेरी काया से प्रकट हुए हो इसलिए तुम कायस्थ कहलाओगे तथा… तुम्हें शास्त्रों के अनुसार क्षत्रियों के रीति रिवाज तथा धर्म विधान का पालन करना चाहिए।’ कायस्थों के बारह पुत्रों — भानु, विभानु, विश्वभानु, वृजभान, चारु, सुचारु, चित्र, मतिमान, हिमवान, चित्रचारु, अरुण तथा अतिन्द्रीय — से क्रमशः श्रीवास्तव, सूर्यध्वज, अस्थाना, बाल्मीकि, माथुर, गौड़, भटनागर, सक्सेना, अम्बष्ठ, निगम, कर्ण तथा कुलश्रेष्ठ वंश चले।
उपरोक्त विवेचना के अनुसार पटना हार्इकोर्ट ने सन 1962 में निर्णय दिया कि कायस्थ जाति का वर्ण क्षत्रिय है।
भारतीय देव भावना प्राचीन है। अपने देवी-देवताओं के रुप, आकार, वर्णादि के विचार एवं प्रतिष्ठा के निर्मित्त भारतीय मनीषा ने वैज्ञानिक और दार्शनिक रुपों में गहन मन्थन किया है। काली, राम, कृष्ण और चित्रगुप्त को छोड़ शेष प्राय: सभी देवी-देवता गौर वर्ण में वर्णित किए गए हैं। गौर या श्याम होना एक दार्शनिक प्रतीक है जिसका मूल आदिम शकित भावना में निहित है।
चित्रगुप्त का अर्थ ही है कि जिसका रुप (चित्र) गुप्त हो, अर्थात दृष्ट न हो। अशेष होने के कारण चित्रगुप्त का रंग न काला है न उजला — वह तो एक सत्ता मात्र है, जो सबके भीतर सिथत है। भगवान चित्रगुप्त का श्यामवर्ण होना उसी तिरस्करिणी भावना का धोतक है — जो सभी रुपों को अपने भीतर समोए हुए एक तत्व के रुप में शेष रहती है।
दीपावली की कालीपूजा के पश्चात यमद्वितीया पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन स्त्रियाँ यमराज को साक्षी रखकर अपने परिवार के दीर्घायु की कामना करती हैं, और पुरुष भगवान चित्रगुप्त की पूजा करते हैं, जिससे अकाल मृत्यु पर विजय की कामना की जाती है।
भगवान राम और कृष्ण के श्याम रुपों के पीछे भी यही दार्शनिक भावना है — ये अवतार पूर्णावतार होकर स्वयं ब्रह्रा ही हैं, और ब्रह्रा कालातीत है, अत: उनका भी श्याम वर्ण ही होगा।
राजस्थान में हिन्डौन नामक स्थान है जहाँ कभी इन्डवन नामक वन था। इस हिन्डौन को एक कायस्थ ने आबाद किया था। हिन्डौन के कायस्थ गाँव करसोली (हिन्डौन से करीब 4 मील दूर) के बिस्वेदार थे। किवदंती है कि करसोली में हुए एक झगड़े में तमाम कायस्थ मारे गये; एक कायस्थ बहादुरी से लड़ा और लड़ते-लड़ते मरा, जो बाद में गोरल बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसका गोत्र करसोलिया आज भी हिन्डौन के कायस्थों में चला आ रहा है।
करसौली की एक गर्भवती कायस्थ स्त्री को पुरोहित दिल्ली ले गये जहाँ उसके लड़का पैदा हुआ। बड़ा होने पर उसने अकबर की रानी हीरादेर्इ के साथ अजमेर यात्रा के दौरान हिन्डवन (आजकल हिन्डौन) में एक शेर का शिकार किया, जिसके फलस्वरुप अकबर ने उसकी इच्छा पर करसौली पर आक्रमण करने की इजाजत दी और उसे अपनी बिस्वेदारी वापस मिली। इसने करसौली के बजाय हिन्डवन में अपने को आबाद किया, जिससे हिन्डवन का नाम हिन्डौन पड़ा।
हिन्डौन के कायस्थों में हरदेव जी का मंदिर, बड़ी हवेली, ठाकुर वाला कुआँ और हरदेव जी की बावड़ी स्थापित की गयी। यहाँ के कायस्थ जयपुर, जोधपुर, उज्जैन, हैदराबाद, दिल्ली तथा गया आदि में मिलते हैं। सन 1951 में कुन्जबिहारी लाल जी माथुर ने भरतपुर में अखिल राजस्थान कायस्थ सम्मेलन बुलाया था।
हैदराबादी संस्कृति देश भर में प्रसिद्ध है, और प्रमुख जाति होने के नाते कायस्थों का इसमें विशेष योगदान रहा। मुगल काल में अनेकों कायस्थ आसफजाही शासकों के साथ आकर यहाँ बस गये। निजाम काल में उन्हें जागीर, मखता, मनसब और योमिया के खिताब मिले; राजा धरम करण निजाम के मंत्री थे।
निजाम सप्तम के समय में पं0 नरेन्द्र जी सक्सेना स्वतंत्रता संघर्ष में प्रथम पंक्ति में रहे। डा0 राज बहादुर गौड़ मजदूर वर्ग की सेवा में समर्पित रहे। शिव प्रसाद श्रीवास्तव विधान सभा सदस्य निर्वाचित हुए। न्यायपालिका, वकालत, चिकित्सा, साहित्य और सरकारी सेवा के क्षेत्रों में भी अनेक कायस्थ बंधुओं ने विशेष योगदान दिया, जिनमें राय पृथ्वी राज सक्सेना, धरम राज माथुर, आनन्द कुमार माथुर, र्इश्वर राज माथुर आदि उल्लेखनीय हैं।
हैदराबाद नगर के उपगुण्डा क्षेत्र में कण्डीकल द्वार के निकट एक चित्रगुप्त मंदिर है, जिसका निर्माण एक श्रीवास्तव कायस्थ ने कराया था। करेन ल्योनर्इ नामक अमरीकी महिला ने हैदराबादी कायस्थों पर शोध कर कैलीफोर्निया विश्वविधालय से डाक्टरेट प्राप्त की, जो सन 1978 में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुर्इ।
मद्रास में भी एक वर्ग चित्रगुप्त वंश का है, जैसा कि ‘गरुण पुराण’, ‘आदित्य पुराणम’ तथा ‘धनाकर स्मृति’ जैसे ग्रन्थों में वर्णित है। श्री गोपी नाथ सक्सेना, बरेली द्वारा लिखित ‘History of Kayastha’ में भी इसका उल्लेख मिलता है। श्री चित्रगुप्त जी की तीन पत्नियों — प्रभावती देवी, नीलावती देवी तथा कारणिकी देवी — का भी विवरण मिलता है।
इस वर्ग के नाम मूदालियर, नायडू, पिल्लै, नायर, राजू, मेनन, राव, रेडडी, करनाम इत्यादि हैं। ये मद्रास, आराकाटा, बंगलौर, आन्ध्र प्रदेश, मैसूर एवं कन्या कुमारी तक पाये जाते हैं। मद्रास और विलौर में श्री चित्रगुप्त जी का मंदिर भी है। इस वर्ग के लोग आल इंडिया कायस्थ कान्फ्रेन्स के मेरठ (1927) तथा इलाहाबाद (1939) अधिवेशनों में सम्मलित हुए।
शास्त्रों के अनुसार भगवान चित्रगुप्त जी के 12 पुत्रों में से एक, सुचारु, गौड़-बंगाल देश में आकर बसे और उनके वंशज गौड़ ब्राह्राण कायस्थ कहलाये। आदि सूर के राज्य काल में कान्य-कुब्ज के राजा ने पांच वीर व विद्वान कायस्थों — मकरन्द, दशरथ, विराट, पुरुषोत्तम तथा कालिदास — को भेजा था, जिनसे घोष, बसु, दत्त तथा मित्र वंश चले।
आदि सूर के लगभग चार शताब्दियों बाद बल्लाल सेन के शासन काल में बंगाल के कायस्थों की चार शाखायें — बंगज, दक्षिण राढ़ीय, उत्तर राढ़ीय और बारेन्द्र — बन गयीं। बल्लाल सेन ने ब्राह्राणों तथा कायस्थों के कुलीन धर्म की स्थापना 9 गुणों के आधार पर की।
अबुल फजल अपने ‘आइने अकबरी’ में लिखते हैं कि बंगाल पर पहले एक क्षत्रिय वंश ने राज्य किया, उसके बाद चार कायस्थ वंशों — भोज, सूर, पाल एवं सेन — ने कर्इ शताब्दियों तक शासन किया। बंगाल एवं आसाम के कायस्थ अपने पूर्वज श्री चित्रगुप्त जी को मानते हैं, और उनकी संतानें घोष, बोस, मित्र, मलिक, गुहा, राय, पाल, डे, वैध, नाग, दत्त इत्यादि नामों से प्रसिद्ध हैं।
बंगाल के कायस्थों में विश्व विख्यात पुरुषों में सर्वश्री अरविन्द घोष, स्वामी विवेकानन्द (दत्त), विपिनचन्द्र पाल (गौड़), सर रास बिहारी बोस, खुदी राम बोस, जगदीश चन्द्र बोस, सुभाष चन्द्र बोस एवं लार्ड एस0 पी0 सिन्हा अग्रणी हैं।
बिहार में कायस्थों का इतिहास काफी पुराना है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार वे र्इसापूर्व तीसरी शताब्दी में ही अपना विशिष्ट स्थान बना चुके थे। नंदवंश के राज्य में मंत्री शकटार कायस्थ थे। गुप्तकाल में कायस्थों को पुन: विशिष्ट जाति का दर्जा मिला; आर्यभटट (476 र्इ0), वाणभटट (हर्षवर्धन काल), तथा सिद्ध लुइया एवं कण्हपा जैसे विद्वान कायस्थ इसी परम्परा से आये।
मिथिला में कर्णाट वंश के शासनकाल में कायस्थ श्रीधर मंत्री रहे, तथा लक्ष्मीधर ने ‘कृत्य कल्प तरु’ की रचना की। अंग्रेजों के आगमन से कायस्थ पुन: प्रकाश में आये और मुंशी के पद पर नियुक्त हुए। सारण जिले के सन्त मंगनीराम और निगुर्णिया सन्त श्री धरम दास तथा भक्तकवि हलधर दास भी चित्रांश परिवार से थे।
स्वाधीनता संग्राम में देशरत्न डा0 राजेन्द्र प्रसाद (देश के प्रथम राष्ट्रपति), सच्चिदानन्द सिन्हा तथा महेश नारायण का विशेष योगदान रहा, जिनके प्रयासों से 1912 में पृथक बिहार प्रान्त बना। लोक नायक जय प्रकाश नारायण का योगदान भी उल्लेखनीय है।
उड़ीसा के कायस्थ परिवारों को कर्ण परिवार कहा जाता है, जिनकी पदवियाँ पटनायक, महान्ति, कानूनगो, दास आदि हैं। ये अपने आपको ‘खंडायत’ (क्षत्रिय) कहते हैं। उड़ीसा में कायस्थ, ब्राह्राण और क्षत्रिय — ये तीन जातियाँ समृद्धि के चरम शिखर पर रही हैं।
कर्ण परिवार के प्रमुख पर्व हैं गम्हा पूर्णिमा (भाद्रपद पूर्णिमा), विजयादशमी और सरस्वती पूजा, जिनमें लेखनी और ताड़पत्र की पोथी की पूजा की जाती है। गम्हा पूर्णिमा के दिन भगवान चित्रगुप्त की पूजा की जाती है।
उड़ीसा के कायस्थ समाज ने राजनीति, साहित्य व संगीत में अग्रणी योगदान दिया है — गोपीनाथ महान्ति (ज्ञानपीठ पुरुस्कार), कालीचरन पटनायक (साहित्य अकादमी पुरुस्कार), श्री बीजू पटनायक व श्री जानकी वल्लभ पटनायक (मुख्यमंत्री), तथा श्री नवीन पटनायक (मुख्यमंत्री) इनमें प्रमुख हैं।
चन्द्रसेन कायस्थ प्रभु का इतिहास बड़े महत्व का एवं रहस्यजनक है। ‘शब्द कल्प-द्रुम’ में कथन है कि चित्रगुप्त वंश के कायस्थ सभी क्षत्रिय माने गये हैं। कथा के अनुसार श्री परशुराम जी ने क्षत्रियों को धरती से विहीन करने की प्रतिज्ञा की, तब अयोध्या के राजा चन्द्रसेन (चित्रगुप्त वंशज क्षत्री) का वध हुआ। चन्द्रसेन की गर्भवती रानी ने पूना के निकट वल्लभ ऋषि के आश्रम में शरण ली।
परशुराम जी ने रानी को इस शर्त पर छोड़ा कि उसके बालक का व्यवसाय लेखक व गणित का होगा और वह सैनिक कार्यों में भाग नहीं लेगा — इस बालक का नाम सोम राजा हुआ। इनकी संतान बड़ी प्रभावशाली हुई और राज्यों में प्रमुख पदों पर नियुक्त हुई, जिन्हें ‘प्रभु’ की उपाधि मिली — इसी से यह वर्ण चन्द्रसेनी कायस्थ प्रभु के नाम से प्रसिद्ध है।
काश्मीर की चिनाब घाटी से आरम्भ होकर वे धीरे-धीरे महाराष्ट्र, कोंकण, कोलाबा, बड़ौदा आदि स्थानों पर बस गये। लगभग डेढ़ शतक पूर्व श्रंगेरी मठ के शंकराचार्य के निर्णय के आधार पर चन्द्रसेनीय कायस्थ विशुद्ध रुप से क्षत्रिय माने गये, और उन्हें वेदाध्ययन व समस्त वैदिक कार्य करने का पूर्ण अधिकार रहा है।
महाराजा शिवाजी के शासन काल में चन्द्रसेनीय कायस्थ प्रभु उच्च पदों पर आसीन रहे और अपनी देशभक्ति व स्वामिभक्ति के लिये विख्यात हुए — बाजी नरस प्रभु, बहिरजी नायक, प्रभु देशपाण्डे, मुराबजी देशपाण्डे, बालाजी आवाजी चिटनिस आदि इनमें उल्लेखनीय हैं। (इस विषय पर और विवरण जल्द ही जोड़ा जायेगा)
| Name of Donor | Contribution |
|---|---|
| Smt. Sadhna Saxena, Jaipur | Land |
| Shri Ambrish Saxena, Jaipur | Rs. 1,00,000/- |
| Shri Praveen Saxena, Jaipur | Rs. 1,00,000/- |
| Smt. Akanksha Saxena, Jaipur | Rs. 1,00,000/- |
| Shri Adarsh Saxena, Hyderabad | Rs. 1,00,000/- |
| Smt. Nidhi Saxena, Hyderabad | Rs. 1,00,000/- |
| Shri R.S. Saxena, Jaipur | Rs. 21,000/- |
| Shri Vishal Saxena, Jaipur | Rs. 21,000/- |
| Unknown | Rs. 5,000/- |
| Advocate Shri Anil Saxena, Kanpur | Rs. 10,000/- |